नारी
नारी
मन होता जिसका कोमल पर चट्टान सी सुदृढ़ होती है,
ग़म में भी जो हर पल मुस्कराना जाने वो नारी होती है,
मिटती है हर युग में नारी न जाने कितनी बार संवरती है,
खुद की साख बचाने को हर बार वो खुद से ही लड़ती है।
फूलों सा कोमल हृदय नारी ममता की मूरत कहलाती है,
चाहे कैसी भी हो तकलीफ़ वो मुस्कुराकर सह जाती है,
आंखों में शर्म का गहना पहनकर हर किरदार निभाती है,
हर परिस्थिति में जो खुद को संभाल लेती वो नारी होती है।
अंबर सी ख्वाहिशें है पर अपनों के लिए सब भूल जाती है,
रीति-रिवाजों के बंधन में बंधकर ही अपना जीवन जीती है,
पर कमजोर नहीं नारी शक्ति यमराज पर भी भारी होती है,
हर रूप में सशक्त किरदार निभाती है जो वो नारी होती है।
त्याग, करुणा, सहनशीलता की मूरत जगजननी कहलाती है,
नूतन प्रसून खिलते जिसमें वो हर बार सम्मान को तरसती है,
तन, मन, धन निसार देती फिर क्यों खंजर सी बोली सुनती है,
खुद के आंचल में खुद के आंसू पोछ लेती वो नारी होती है।
नारी बिना आधार नहीं सृष्टि का वो जीवन का मूल होती है,
खुद की हस्ती भुलाकर नारी संस्कारों से परिवार संजोती है,
सागर सा विशाल हृदय रखती जीवन को सुरभित करती है,
अपने हौसलों से जो तकदीर बदल देती है वो नारी होती है।
