मय्यत
मय्यत
डोली सज रही हो जैसे,
मय्यत मेंरी सज रही थी।
गहेरी नींद में में सौ रही थी,
जगाते रहे थे वो सब,
जिन्हें में हर सुबह जगाया करती थी।
न जागे तो अकसर डांटा करती थी,
पर आज सभी की आँखे बेहिसाब रो रही थी ।
वही लाल जोड़ा, माथे पे बिंदी सज रही थी,
जैसे सजधज कर दुल्हन बनकर
मैं इस घर आ रही थी।
कभी न लाते थे वो गजरा
मोगरे के फूलों वाला,
वो अकसर भूल जाते थे,
आज महबूब के हाथों में
फूलों से सज रही थी।
कारोबार में खोये रहते वो
न कभी नज़र भर के देखते थे,
आज उनकी नज़र मेरी सूरत से
हट नहीं रही थी।
जिनको कभी कांधों में
बिठाके घुमा करती थी,
आज उन्हीं के कांधे पे चढ़कर
मैं सफर पे निकल पड़ी थी।
कमाल तो तब हुआ कि
हर एक अपना अपनापन दिखा रहा था,
जब सांसे मेरी धड़कना छोड़ चुकी थी
गर पता होता की मौत आने पर,
हर एक अपना करीब आने लगता है।
मैं बेवकूफ उन अपनों के लिए
आज तक जिये जा रही थी।
जला दिया हमको लकड़िओं के बीच सुला के,
जिनके लिये रोज में चूल्हा जलाया करती थी।
उडाता रहा धुँआ मेंरी लाश के दहन का,
मैं राख का ढेर बनके बिखर रही थी ।
हर एक शख्स मुझे वही छोड़ के जा रहे थे,
मेरी रूह अंतिम बार सबको
पीछे मूड़-मूड़ के देख रही थी।
