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Rahul Swami

Romance

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Rahul Swami

Romance

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर

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बीती यादों का मुसाफ़िर हूँ मैं

जब जी चाहे, लौट जाता हूँ

उस गली के उस मोड़ तक,

उस घर तक जाता हूँ 

जिसे वक़्त दिया करता था

बड़ी फ़ुरसत में खड़े होके 

उस हसीन चेहरे के दीदार 

और एक आवाज़ की तलाश में ना जाने 

कब वक़्त गुज़र जाता था,

मैं हमेशा ख़ुद को ढली शाम में ही पाता था। 


उन ढली शामों का मुसाफ़िर हूँ मैं 

जब जी चाहे, दौड़ जाता हूँ

फिर लिखने उन ख़तों को जो आईना थे मेरे दिल का 

हर एक हर्फ़ साँस से बना था मेरी 

जो लिपटा था मेरी रूह के लिबासी लिफ़ाफ़े में

मैं लिखता उन ख़तों को खिड़की के

किनारे ही सो जाता था। 


उन बेताब रातों का मुसाफ़िर हूँ मैं 

जो सोते जागते गुज़री थी इस ख़्याल में तेरे 

कब खत सुबह तुझ तक पहुँचे और मेरा दिन चढ़े 

सिक्के लिए घर से जाता था उस कुएँ पे 

हर डूबते सिक्के के साथ दुआ यही के 

ज़िंदगी भर साथ तू रहे मेरे। 


उन बहते जज़्बातों का मुसाफ़िर हूँ मैं 

जिनसे हिम्मत मिली के रूबरू हो सकूँ तेरे 

बिना पलकें झपकाए,

कुछ बोले बिना ना खड़ा रह जाऊँ 

बयान करूँ हाल सभी दिल के 

तुझे खत देकर तेरे होठों पे अपने लफ़्ज़ों को पढ़ना 

बस एक वही लम्हा याद है तेरे इनकार के सिवा मुझे।


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