STORYMIRROR

Khushboo Pathak

Abstract

3  

Khushboo Pathak

Abstract

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर

1 min
26


 मैं यूं ही आगे बढ़ता रहा

 मुसाफिरों का कारवां चलता रहा

 हजारों मुश्किलें आई राहों पर 

आंधी तूफान साथ लायी

 हवा का रुख भी कुछ बदल सा गया

 मौसम ने भी ली अंगड़ाई 

पर मैंने उफ तक न की 

और चलता रहा अपने आशियाने की ओर 

परेशानियों का सामना करता रहा 

 मुश्किलों से जूझता रहा 

पीछे मुड़कर ना देखा कभी 

 बस मिलो पैदल चलता रहा

 पांव में छाले पड़ गए 

शरीर में थकन सी आ गई 

बेहोशी का आलम सा छा गया 

तब भी खुद को संभाला 

 फासलों को मिटाने की कोशिश करता रहा 

अपनी मंजिल की ओर बढ़ता रहा 

मैं मुसाफिर चलता रहा ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract