मुहब्बत
मुहब्बत
कुछ अंतर तो ज़रूर है एक नाबालिग़ किशोर और एक सुलझे हुए पुरुष की मुहब्बत में,
एक आपको हर हाल में पाना चाहता है तो दूसरा आपके लिए दुनिया वारने का जज़्बा रखता है.
नाबालिग़ मुहब्बत में जूनून तो बेशुमार होता है पर समझ, समझदारी और दुनियादारी से परे होती है इस प्रेम की दास्ताँ,
आखिर दिल के मामले समझ और सोच के दायरों को सच्चा प्रेम समझता है कहाँ.
पर ज़िन्दगी जीने के लिए सिर्फ मुहब्बत और जूनून का होना काफी नहीँ,
इसलिए समझ और समझदारी का समन्वय होता है एक व्यसक का प्रेम जिस में होती .
इश्क़ तो एक पवित्र भावना है जो वासना और लिप्सा से परे है,
यही भली भांति समझाता एक व्यसक का प्रेम,
लड़कपन और जवानी के जोश में होश खोने वाले आशिक अक्सर हों जाते ज़िन्दगी के सफर में ढेर.
सिकंदर तो वहीँ है जिसने फूंक फूंक के हर कदम बढ़ाया, पग पग पर की जिसने मंत्रणा और मंथन,
जीवन समुन्दर से अपनी नाव को खे कर वहीँ पहुंचा पाए जिन्होंने इश्क़ का लिया सच्चा मायना समझ.
गर्दिश में रह जाती ज़िन्दगी जब डोलती हुई जीवन की नैय्या को पार पहुंचाने के लिए खेवय्या नहीँ मिलता,
प्यार और साथ तो मिलता है भरपूर पर सच्चा हमसफ़र नहीँ मिलता.
हमसफर मिल भी जाएं पर एक हमनवाँ नहीं मिलता,
भटकती रूह को कारवाँ नहीं मिलता,स्वप्न नगरी तो मिलती है पर साक्षात सजीला जहां नहीं मिलता.
कुछ अंतर तो ज़रूर है एक नाबालिग़ किशोर और एक सुलझे हुए पुरुष की मुहब्बत में,
एक में मुहब्बत मिलती है पर मुकद्दर नहीं संवरता तो दूजे में मंज़िल मिल जाती, मुकाम मिल जाता, जिससे समूचा जीवन मुहब्बत और सिर्फ मुहब्बत से भर जाता।
