मतलबी नगर : मतलबी चेहरे...
मतलबी नगर : मतलबी चेहरे...
बात है कड़वी, मगर
सौ प्रतिशत असली सोने-सा है!
एक ऐसा मतलबी नगर,
वहाँ के अधिकतर मतलबी चेहरे...
जब अधिकतर लोग
मुझसे (शिक्षक जयंत) से
स्वार्थ सिद्धि हेतु
संंपर्क साधा किए,
तो अतिशयोक्ति भरा
दिखावे की प्रशंसा से
तथाकथित 'अपनेपन' का
'उमदा' अभिनय करते
अनगिनत चेहरे
मेरे चहुंओर
मंडराते नज़र आते रहे...
मगर जब उनका
'मतलब' निकल गया,
तो वो अपनी
पुरानी 'चाल' खेल गए...!!!
आदतन उनका
'रवैया' ही बदल गया...
आखिर यही तो होना था...!
(जिसे मैं, शिक्षक जयंत,
कभी समझ ही न पाया...!!!)
एक ऐसा अजीबोगरीब नगर,
जहाँ मैं, शिक्षक जयंत, ने
'परसेवा' में
सन २००८ से सन २०२२ तक का
सुदीर्घ समय
'स्वचिंता' त्यागकर
सिर्फ 'परचिंता' में
अपना उम्र बिता दिया,
आज जब
उस 'मतलबी नगर के
अधिकतर मतलबी चेहरों से
कोसों दूर
पूरे स्वाभिमान से
अपने होशोहवास में
ईमान से जीवन निर्वाह कर रहा हूँ...
कभी-कभी आदतन जब भी
'उस स्वर्णिम' अतीत को
कुरेदता हूँ...
तो उसमें से केवल
'राख' ही राख निकलता है...
जो इस बात का
एकमात्र 'मूक' साक्षी है
कि जब भी उस
मतलबी नगर के 'नाट्यमंच' में
विभिन्न प्रकार के
'कौतुकाभिनय' पेश किए गए,
वो महज़ सामयिक कौतूहल
बढ़ाने के ही काम आए,
मगर आज उसमें तो
'छल-कपट-स्वार्थ' के सिवा
और कुछ नज़र आता ही नहीं...!!!
बात कड़वी है, मगर
सौ प्रतिशत असली सोने-सा है...!
आज मैं, शिक्षक जयंत,
अपनी 'मूल्यहीन' दार्शनिकता पर
'कटाक्ष' करता हूँ...
कि 'क्यों' मैंने 'सर्वप्रथम'
स्वचिंता नहीं की...
क्यों मैंने 'अपने को नहीं समेटा'...
क्योंकि ये तो पकड़ में आ ही गई
कि 'उस मतलबी नगर' के
'उन मतलबी चेहरों' की
दास्ताँ कभी खत्म नहीं होगी...
मगर उस 'मतलबी जमघट' में
मेरे दिल में बसनेवाले 'कुछ गिनेचुने'
निस्वार्थ व्यक्ति भी हैं, जिनको मैं
आजीवन नमन करता हूँ...
जिन्होंने हमारे 'बुरे वक्त में' हमारा साथ नहीं छोड़ा...।
(बाकी बचे बस वक्त की धूल और
पंकिल कंटकाकीर्ण जीवनावधि में
हमारे साथ घटनेवाली 'कौतुकाभिनय'...)
अलविदा मतलबी नगर...!!!
अलविदा मतलबी चेहरे...!!!
विश्वासघात !!!
विश्वासघात !!!
विश्वासघात !!!
