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Pooja Agrawal

Abstract

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Pooja Agrawal

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मोक्ष

मोक्ष

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मन व्यथित है मेरा,वियोग से भरा हुआ

प्रफुल्लित हो जाऊं प्रभु,उस गांव की ओर ले चलो

भटका हुआ मुसाफिर हूं, मंजिल नहीं आती नजर

मार्गदर्शन करो मेरा, सुमार्ग पर ले चलो


डर जाता हूं मैं,अपने मन के विचारों से

अपने ही अंधेरों में घर जाता हूं मैं कब से

तुम दीप जलाकर ज्ञान का, प्रकाश की ओर ले चलो

रिश्तों में जकड़ गया हूं,भावनाओं की बेड़ियों में बंध


सच और झूठ के तराजू में खुद को तोलता हूं रोज

अचेतन हो गई आत्मा ,टांडव मचाता है चित् मेरा

आत्मा को चेतनता दो, परम सत्य की ओर ले चलो

खुद से आगे सोच सकूं मैं, अपना स्वार्थ छोड़ सकूं


अपने अंतरण की सुनो सद्भाव का बीज बो सकूं मैं

प्रेम की नये कुसुम खिलें, ऐसे गुलशन में ले चलो

हे जगत दाता, हे दीनदयाल,

नैया तुम्हारे हाथों में ,पतवार तुम्हारे हाथ में

कब से सौप दिया मैंने यह भार तुम्हारे हाथों में


मेरे कर्मों का लेखा जोखा है तुम्हारे हाथों में

मुक्त कर दो, मृत्यु जीवन के चक्रव्यूह से

मोक्ष की तरफ ले चलो।


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