STORYMIRROR

minni mishra

Abstract

4  

minni mishra

Abstract

मोहन

मोहन

1 min
463

मोहन

बार-बार मैं तुझे बुलाती,

रो-रो कर अपना दुखड़ा सुनाती,

पर , तुम रहते हो मगन,

अधरों से मुरली को लगाए,

देखो, अब ये मुरली मुझे नहीं सुहाती।


लाओ कान्हा, दे दो मुरली,

मैं गाऊँगी...तू सुन लो मेरी ।

तूने बहुत राग अलापे ,

पनघट पर खूब रास रचाये ,

प्रिय, नयनों में अब मुझे बसा लो,

इस दुखिया का क्लेश मिटा दो !


मैं आयी हूँ तेरे द्वारे,

थक गई ..अब लड़ते-लड़ते,

जीवन की मझधार-भंवर से,

अब तो मुझे गले लगा लो मोहन,

मन से मन का तार मिला लो मोहन,

इस मीरा का संताप मिटा दो मोहन।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract