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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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मन की उलझन

मन की उलझन

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मन के उलझनों का कैसे निराकरण करूं?

कभी मन किसी बात को लेकर हामी भर देता है

और कभी कहने लगता नहीं है ये सही नहीं होगा।

कैसे करूं क्या करूं कुछ समझ नहीं आता  

बस लगता है की कुछ ऐसा हो जो सही हो

कोई तो जो मेरी उलझनों को दूर करने में मदद करे। 

क्या ये करना उचित होगा , 

इसका कोई नकारात्मक परिणाम तो नहीं निकलेगा ना

और अगर मैंने ये कर भी लिया तो कैसे आगे आने वाली परेशानियों से लडूंगी।

ऐसे विभिन्न विभिन्न प्रकार के प्रश्न मन में जन्म लेते है

और आप इस प्रश्नों का जवाब नहीं ढूंढ पाते।

 माना ये युद्ध शुरू होने से पहले ही मैदान छोड़ने वाली बात हो जाती है

परंतु ये पता होने के बावजूद भी आप खुद को नहीं समझा पाते ।

मन हमारी लाख कोशिश करने के बाद भी

मैदान में जनक लिए तैयार नहीं होता

उसे लगता है कोई तो उसका हाथ पकड़ के सही राह दिखाए।

कहते है सिक्के के दो पहलू होते है जहां नकारात्मकता होती है

वही कही सकारात्मकता भी होती है

परंतु मन जो उलझनों के भंवर में फंस चुका है

उसे निकलना बेहद कठिन हो जाता है। 

     


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