मन की पीड़ा।
मन की पीड़ा।
हे !जगत के पालनहार, अंतरमन की पीर देख जा।।
नियमों की जंजीरों में बँधकर, मेरी बाणी मौन हो गई,
तूफानों में फँसी है नैया, ना जाने कहाँ गुम हो गई,
हे! मेरे प्राणों से भी प्यारे, इन नैनन के नीर देख जा।।
जीवन के हर कठिन मोड़ पर, हरदम ली परीक्षा हमारी,
भटक रहा था गली-गली, कहीं तो मिलेगी छवि तुम्हारी,
तीरथ कर -कर छाले पड़ गए, अब तो मेरी हालत देख जा।।
जब- जब तुम को पाना चाहा, संसार ने उतना ही उलझाया,
तड़प उठा मन जब मिलने को, अपनों ने ही मुझको भटकाया,
तुम तो हो अंतर्यामी, दिल में चुभे अब शूल देख जा।।
ना जाने कितने रूप तुम्हारे," चतुर्भुज" रूप मुझको है भाया,
कभी परम भागवत बनकर, "रामाश्रम" का परिचम लहराया,
मैं तो ठहरा दीन भिखारी, मेरी बिगड़ी तकदीर देख जा।।
एक बार तो दरस दिखा दो, हृदय की तुम तपन बुझा दो,
पता नहीं कब थम जायें साँसे, अपनी नूरानी सूरत दिखा दो,
" नीरज" है व्याकुल तुम्हारी कृपा का, छूटा जाता धीर देख जा।।
