STORYMIRROR

Geeta Upadhyay

Inspirational

4  

Geeta Upadhyay

Inspirational

मन की बात

मन की बात

1 min
219


ना थी पतवार और ना ही कश्ती

डूबतों को देखकर लगा कि जिंदगी है कितनी सस्ती

काश ना होता गमों का गुबार

ना होते दुखों के पहाड़

हमारे ख्वाबों सी होती एक हंसी बस्ती

झुकती थी जहां आसमां की भी हस्ती

वर्षा की बूंदों में झरते थे मोती

निशा की आगोश में शीतल चांदनी थी सोती

चंचल किरणें खिलखिलाती

नदियां थी अठखेलियां खाती

छल -छल करते झरने

 पवन के चलते ही फूल लगते थे झड़ने

शबनम से सीचें

 मखमली घासों के गलीचे

 आकाश में उड़ते स्वच्छंद परिंदे

कलियों को चूमती तितलियां

 फूलों पर मंडराते थे भंवरे

 जानवर भी लगते थे सजे संवरे

मंदिरों से लगते थे मकान

 हर चेहरे पर दिखते थे भगवान

 प्यार प्रेम ना कोई घात- अघात

परेशानियों का ना था दूर तक साथ

स्नेहा प्रेम और ढेर सारा विश्वास

 सभी को मिले खुशियों की सौगात

खत्म हो जाएंगे हजारों पन्ने

 पर पूरी ना होगी

" मन की बात ।"

   


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational