मन(गजल)
मन(गजल)
सच में देखा मन मनचला हो गया,
जिधर दिल चाहा उधर ही खो गया।
मन ने पार कर दी हैं सारी हदें,
किधर जा रहा है नहीं दिखती सरहदें।
न मंजिल कोई न रास्ता बड़ा, मनचला हो गया मन,
बड़ा बेबस हो गया यह मन।
निकाल दिया जिसे मन से,
उसी को पुकार रहा है यह मन।
स्वप्न बड़े बड़े लेता है पर
मंजिलों को पाने की उलझन में है यह मन।
फिसलता है, उछलता है कई बहाने बनाता है मन,
अपने ही काबू में रखता है सारा तन बहुत बलशाली
बनता है यह मन।
ऋषियों, मुनियों ने भी आजमाया है यह मन नहीं
काबू आया , बहुत निराला है यह मन।
कितना समझाऊं कैसे मनाऊं, संभाले से भी नहीं
समझता है सुदर्शन यह मन, वायू की तीव्र गति से चलता
है मनचला मन।
