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Kanchan Prabha

Abstract

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Kanchan Prabha

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मकान अब घर दिख रहे हैं

मकान अब घर दिख रहे हैं

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धरती की बेजान हुई परतों पर 

विधाता के आशीर्वाद की नजर दिख रही है 


उफनते समुद्र में दशहत की सोनामी हुआ करती थी

वहीं सपनीले रेत पर शांत सी समंदर दिख रही है


प्रदूषण के जंग की जो नजर लग चुकी थी

प्रकृति में प्रेमसुधा सी असर दिख रही है


गर्म हवाओं में कभी चिलचिलाहट हुआ करती थी

सुनहली धूप में अब नमी की पहर दिख रही है


जहाँ सूखी पत्तियों की चरमराहट हुआ करती थी

उस हरे दरख्त पर चिड़ियों के बसर दिख रही है


बेजान सी खण्डहर चुपचाप रोया करती थी

बदलती हुई सी सब शहर दिख रही है


जहाँ ईंट पत्थरों के मकां हुआ करते थे

अब उसकी जगह हँसती हुई घर घर दिख रही है 


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