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sargam Bhatt

Tragedy

4  

sargam Bhatt

Tragedy

मजबूर औरत की कहानी

मजबूर औरत की कहानी

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ओढ़ ली है गम की चादर मैंने,

खुशियां क्या होती हैं मैं भूल गई।

जाने किस बात पर खामोश हो गई मैं,

पहले की तरह अब बोलना भूल गई।

हुनर तो मेरे अंदर भी हैं बहुत सारे,

उसको निखारने का समय ही भूल गई।

परिवार संग बिताती थी छुट्टियों के दिन,

पर छुट्टियां क्या होती हैं ,

परिवार कैसे होते हैं मैं भूल गई।

खामोशी ओढ़ ली है मैंने,

जाने किस सोच में मैं खो गई।

चाहत थी मेरी मैं भी खिलखिलाकर हसूंं ,

रोती तो नहीं पर हंसना भूल गई।

चाहत थी किसी अपने की जिससे मैं भी शिकायत करूं,

पर कौन अपना है मैं तो यह भी भूल गई।

कुछ उम्मीदें थी कुछ मेरे अपने सपने भी थे,

बंधन में बंधकर वह सपने क्या थे भूल गई।

सोचती थी प्यार के बदले प्यार मिलेगा,

पर प्यार क्या होता है यह तो सोचती ही रह गई।

मुझे तो इतना पता था सभी खुश रहेंगे तो खुशियां मिलेगी,

सबको खुशियां देते देते मैं खुद को ही भूल गई।

टूट गए सारे ख्वाब मेरे मैं देखती रह गई,

कुछ कर भी ना सकी अपने लिए,

मैं अभागी खुद को कोसती रह गई।


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