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Archana kochar Sugandha

Abstract

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Archana kochar Sugandha

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मेरी माँ

मेरी माँ

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मेरी जिंदगी की पहली गुरु हैं मेरी माँ 

खूबसूरत जिंदगी की शुरुआत हैं मेरी माँ।

पहला अक्षर ज्ञान हैं मेरी माँ 

समाज में मेरी पहचान हैं मेरी माँ।


मेरी जीवन का रूप सौंदर्य हैं मेरी माँ 

धन-संपदा और ऐश्वर्य हैं मेरी माँ।

मैं हर पल नन्हा, अबोध और अज्ञान हूँ 

मेरी उंगली थाम कर,

सिखाती दुनिया का ज्ञान मेरी माँ।


जीवन में हैं बड़ी ठोकरें,

आँधी और तूफान मेरी माँ 

हर घड़ी, साथ खड़ी हैं ताने वितान मेरी माँ।

गुरु को भगवान, का पाठ पढ़ाती हैं मेरी माँ 

उनकी शरण में सारे ठाठ बताती हैं मेरी माँ।


फल वाले पेड़ों की तरह झुकना सिखाती हैं मेरी माँ 

बुलंदी में अहं भाव त्यजना सिखाती हैं मेरी माँ।

स्वयं भूखी रह कर हमें खाना खिलाती हैं मेरी माँ 

प्यार में त्याग भावना पर इठलाती हैं मेरी माँ।


अल्हड़, अबोध और अंजान जिंदगी में

हर पल साथ खड़ी रहती हैं मेरी माँ 

जिंदगी की कठिनाइयों को भी

बहुत बड़ी नहीं कहती हैं मेरी माँ।


अगर जिंदगी में हर पल साथ

खड़ी नहीं होती मेरी माँ 

शायद जिंदगी के सुरों की

लय-ताल इतनी बड़ी नहीं होती।


काश ! मेरी तकदीर लिखने का

हक रखती मेरी माँ 

मेरे हाथों की लकीरों की

सम्पूर्णता पर मर मिटती मेरी माँ।


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