STORYMIRROR

Pradeep Pokhriyal

Tragedy Inspirational

3  

Pradeep Pokhriyal

Tragedy Inspirational

मेरी आवाज

मेरी आवाज

1 min
375

एक महल की चाहत,

एक कोलाहल की प्यास।

बनती रही, छुपती रही,

मेरी झिझकती आवाज़ ।।


स्वप्न में बना राजा

सर झुकाया मंत्रियों ने।

पौ फटते ही लौटी फिर,

मेरी झिझकती आवाज़।।


पिघलते नारों का शोर,

झुकते उठाते झंडों की आस।

टोपियों के बीच सहमी,

मेरी झिझकती आवाज़ ।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy