मैं प्यार नहीं, आदत हूँ तुम्हारी...
मैं प्यार नहीं, आदत हूँ तुम्हारी...
जैसे सीपियों से मोती अलग नहीं,
वैसा रिश्ता है हमारा,
जैसे मछलियां पानी से अलग नहीं,
ऐसा प्यार है तुम्हारा!
मगर मछली को क्या पता,
पानी पर तो पूरे समंदर का हक है,
वह तो है सिर्फ एक हिस्सा समंदर का,
समंदर के सामने उसका क्या वजूद है?
मगर कोई पूछे उस मछली से,
पानी सिर्फ पानी नहीं, उसकी ज़िंदगी का हक है।
वो पानी मछली की हर एक साँस की कीमत तो जानता है,
मगर वफ़ा निभाने की बारी आए,तो वो सिर्फ समंदर को पहचानता है।
मछली के लिए वो पानी उसकी पूरी दुनिया था,
पर पानी के लिए वो मछली सिर्फ एक मेहमान थी।
वो साथ तैरती रही जिसे अपना नसीब समझकर,
पानी उसे बहलाता रहा बस अपनी एक आदत समझकर।
जब बुलावा आया समंदर का,
तो पानी ने रुख मोड़ लिया,
एक पुरानी आदत की तरह,
उसने मछली को पीछे छोड़ दिया।
तब जाके मछली को एहसास हुआ,
ना वो प्यार था ना था उसका जीवन,
वह तो सिर्फ एक आदत थी पानी की राह की,
जिसकी आख़िरी मंज़िल तो हमेशा समंदर की पुकार थी!
