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Nisha Mandani Menda

Abstract Tragedy

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Nisha Mandani Menda

Abstract Tragedy

मोतियों की माला...

मोतियों की माला...

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मोती की माला पिरोयी थी तुमने,
परिश्रम और धैर्य से उसे सींचा था,
तुम थी तो माला थी,
तुम्हारे प्यार के धागे से उसे बाँधा था


तुम थी तो त्योहारों के झूले थे,
खुशियां हर रोज़ दस्तक देती थीं,
चाहे कितना ही संघर्ष क्यों न हो,
तुम हौसले से डटी रहती थीं।

तुम्हारे जाने से यह अहसास हुआ,
कि रिश्ते भी खोखले होते हैं,
पैसों के आगे तो,
 सब फीके पड़ते हैं।

अब परिवार तो एक सपना सा लगता,
सब अपने-अपने में रहते हैं,
रिश्ते तो बस नाम के हैं अब,
 हाई,हैलो, ही कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का वो धागा क्या टूटा,
मोतियों की वो माला ही बिखर गई,
जिस घर में कभी खुशियों की रौनक थी,
वहाँ अब सिर्फ पैसों की खनक रह गई।

आज समझ आता है कि धागा तुम थीं और मोती हम,
तुम्हारे बिन अब बिखर गए हैं हम,
बड़ी खामोश सी अब ये दीवारें हैं,
बस यादों के साये में सिमट गए हैं हम।


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