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Nisha Mandani Menda

Abstract Inspirational Others

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Nisha Mandani Menda

Abstract Inspirational Others

बसेरा...

बसेरा...

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कहीं दूर जाना था,
खुद को बसाना था,
जहाँ तुम और मैं हो,
जहाँ न कोई बैर हो।

दूर तो आ गए,
घर भी बसाया,
पर इस सफर में खुद को ही भुलाया,
लड़खड़ाकर, रोकर खुद को समझाया!

कि प्यार कभी न काफी था,
न मैं काफी थी तुम्हारे लिए,
रोशन करते थे कभी जो,
बुझ गए वो प्यार के दीये!

एक सपना जो टूटा,
तो दूसरा सजाया था,
मम्मी-पापा से जो हौसला सीखा,
उसे फिर से अपनाया था!

मन करता है फिर उन गलियों में जाएँ,
जहाँ बचपन गुजारा था,
फिर मम्मी-पापा का हाथ थामें,
जिन्हें अब सहारा अनिवार्य था!

अब जो दूर हैं वो पास लगते हैं,
जो पास हैं वो एक आस लगते हैं,
सुकून की उस छाँव को अब भी तरसते हैं,
जहाँ बचपन छूटा था, हम उन गलियों को ढूँढते हैं।

एक सपना अब भी आँखों में पलता है,
एक नया घर, जहाँ बस प्यार फलता है।
जहाँ हम हों साथ, और कोई शिकवा न हो,
खुशियों का आँगन हो, जहाँ कोई तन्हा न हो।

हमारा बच्चा उस आँगन में खिलखिलाए,
दौड़ते हुए वो नन्हे कदम, सुकूँ ले आए।
वही पुरानी सादगी, वही बचपन की छाँव,
हम मिलकर बसाएँगे अपना वो छोटा सा गाँव।

जो खोया था पहले, उसे फिर से सजाना है,
अपनों की बाहों में ही अब खुद को पाना है।
एक ऐसा परिवार, जहाँ बस हँसी की गूँज हो,
जहाँ हर कल, गुज़रे कल से भी ख़ूबसूरत हो।


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