मैं कविता
मैं कविता
न छंदों में,न अलंकारों, मुहावरों में बंधना चाहती हुँ।
न रस ,लय ,ताल की मोहताज सुमधुर कंठ चाहती हूँ।
मैं कविता हूँ, अभिव्यक्त होना चाहती हूँ..
सौंदर्य के पिटारे से मुक्त होना चाहती हूँ....
अनकही उपेक्षित अभ्यर्थनाएं अभिव्यक्त करना चाहती हूँ।
मानवीय संवेदनाओं को हर हृदयस्थल भरना चाहती हूँ।।
मैं कविता हूँ, अभिव्यक्त होना चाहती हूँ..
सौंदर्य के पिटारे से मुक्त होना चाहती हूँ....
सुप्रसिद्धि की चाहतें न ऊँचे नामदारों की तलाश ही है।
भावों के मंच पर,मानव-मन में सिरमौर होना चाहती हूँ।।
मैं कविता हूँ, अभिव्यक्त होना चाहती हूँ..
सौंदर्य के पिटारे से मुक्त होना चाहती हूँ....
संवेदना के अंतिम छोर तक अभिव्यक्त होना चाहती हूँ।
कविता हूँ ,सौंदर्य के पिटारे से अब मुक्त होना चाहती हूँ।।
मैं कविता हूँ, अभिव्यक्त होना चाहती हूँ..
सौंदर्य के पिटारे से मुक्त होना चाहती हूँ....
कड़कड़ाती सर्दी से मृत आदमी को किस काल में बांधोगे।
धूप में तपते हुए को किस रस,रूपक,विधान में ढालोगे।।
मैं कविता हूँ, अभिव्यक्त होना चाहती हूँ..
सौंदर्य के पिटारे से मुक्त होना चाहती हूँ....
कोहरे ठिठुरन भरी रातों में, टीन पोलीथीन के अहातों में।
छंद, कुंडली ,चौपाई, कवित्त, कवि के विरक्त खातों में।।
मुक्त होना चाहती हूँ...
मैं कविता हूँ अभिव्यक्त होना चाहती हूँ...
