STORYMIRROR

प्रवीन शर्मा

Abstract Others

4  

प्रवीन शर्मा

Abstract Others

मैं खुद बच्चा हो जाता हूं

मैं खुद बच्चा हो जाता हूं

1 min
277

कभी झिलमिल कभी हिलमिल

वो मेरे पास आती है

मेरी आवाज सुनकर ही

खिलौने भूल जाती है

फिर मैं सब भूल जाता हूं

वो जब बाहों में आती है

प्यार के मोती गिरते है

कहीं पायल छनकाती है

मेरा मन फुदक उठता है

वो जब जब साथ चलती है

मां के पल्लू से छुपकर

वो इतना मचलती है

किलकारी से अपनी

दर्द मेरे डराती है

सिरहाने बैठकर मेरे

मुझे लोरी सुनाती है

मेरे सोने से पहले ही

थक कर सो जाती है

मेरी गुड़िया है गुड़ जैसी

जितना घोलता हूँ जिंदगी मीठी हो जाती है

शाम को ऑल इंडिया रेडियो छुटकी जो सुनता हूँ

खबर कोई मेरे घर की, कहाँ फिर छूट पाती है

मैं खुद बच्चा हो जाता हूं

जब वो पापा बुलाती है.


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract