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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

Abstract

मैं और माँ

मैं और माँ

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मैं और माँ साथ साथ चले

जैसे चलता है

समय के साथ आनन्द

हवा के साथ खुशबू


सूरज के साथ रौशनी

चाँद के साथ चांदनी

अनुभव के साथ शब्द

राग के साथ गीत।


इस तेज रफ्तार से 

भागती हुयी दुनिया में

तेजी से भागते हुये मनुष्य की

मनुष्यता निचुड़ निचुड़कर

साथ होती गयी


फिर भी मनुष्य चला जा रहा है

अपनी निर्धारित मन्जिल की तरफ

अपनी बुद्धि बल के

वशीभूत हो।


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