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GOPAL RAM DANSENA

Tragedy

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GOPAL RAM DANSENA

Tragedy

मानवता

मानवता

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इंसान समाज में

खेल रहा आज आग में

कभी जीवन दांव तो

कभी पग दो नांव में ,

पर वह इंसान जो

इस धरा पर पलता था

मानवता जिसके साथ चलता था

वह छोड़ आया मानवता

किताबों की गठरी में ,

मानव का निवास अब

बेरहम नगरी में

वह मरता है मारता है

इतने के बाद भी

शेखी बघारता है ,

भेष बदल वहीं

अधर्म को धर्म सी

संवारता है

और लज्जित हो मानवता

पोटली से पुकारता है,

रे मानव तू झूठी शान से

क्यों खुद को पुचकारता है

झूठी शान से क्यों खुद को

पुचकारता है!


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