मां...।
मां...।
मां जो खुद को भूल जाती है कि वो एक इंसान भी है,
जिसके भी कुछ अरमान है, कुछ ख्वाब है,कुछ ख्वाहिशें हैं,
मां जो ज़िम्मेदारियों को अपना कर्तव्य समझती है,
उस मां को ही बच्चे बोझ समझते हैं,
जिस मां ने बच्चों की जिम्मेदारी अपने कांधो पर ले,
अपनी खुशियों की परवाह नही की,
उस मां की खुशियों की आज किसी को परवाह नही,
जिस मां ने बुखार मैं भी हमें भूखा नही रहने दिया,
सर्दियों में अपनी चादर भी हमें उड़ा दी,
गर्मी में अपने आंचल से हवा करती रही,
बरसात में खुद भीग बच्चों को भीगने से बचाती थी,
आज वो मां बुखार में तप रही भूख से बिलख रही,
बरसात में भीग रही सर्दी से कांप रही थी
पर किसी को उस मां की परवाह नही,
क्यों हम मां के प्यार को जिम्मेदारी का नाम दे पलड़ा झाड लेते हैं?
क्यों हम मां के प्रति अपने कर्तव्यों को नही समझते?
क्यों हम इतने लालची स्वार्थी हो जाते हैं?
क्यों हम मां की ममता को जिम्मेदारी का नाम दे देते हैं?
जब वो खुद को भूल मां बन हमारी देखभाल करती है,
तो हम क्यों न उनके बच्चे बन उनकी परवाह करें,
बेशक पूरा समय नही पर कुछ समय उनके साथ रहे,
सोचों जब वो हमें बोझ नही मानती तो हम क्यो उन्हें?
जब वो हमारे लिए खुद को खुद के सपनो को भुला सकती है,
तो हम अपना कुछ समय उनके साथ नही बांट सकते,
पास बैठ उनसे बातें नही कर सकते,
क्या हम इतने व्यस्त हो गए अपनी लाइफ मे,
कि जिन्होंने हमें यह जिंदगी दी उनको ही भूल गए,
जिन्होंने पाला पोसा बड़ा किया उनको भूल गए,
जिन्होंने हमारे सपने पूरे किए उनको भूल गए,
जिनके साथ कांधे पर दुनिया घूमी उनको भूल गए।
भूलो मत आज तुम बेटे हो कल तुम्हारे बेटे होंगे,
कल तुम खुद इस स्थिति में होगे,
क्योंकि बच्चे वहीं करते है जो वो बड़ों को करते देखते है।
