लापता हूँ कब से
लापता हूँ कब से
लापता हूँ कब से मैं, अपनों ही की भीड़ में,
पराया सा हो गया हूँ मैं, अपनी ही दुनिया में।
आज़माईश करवाते करवाते थक गया हूँ मैं,
लड़े बिना ही ज़िन्दगी की जंग हार गया हूँ मैं।
लापता हूँ खुद से ही, मारा मारा फिरता हूँ मैं,
खुद को बाहर खोज रहा आवारा फिरता हूँ मैं।
इस आवारगी में जीने का ही सबब भूल गया हूँ,
मैं इन्सान हूँ, इन्सानियत ही अपनी खो चुका हूँ।
