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Vijayanand Singh

Inspirational Others

4  

Vijayanand Singh

Inspirational Others

कविताएं

कविताएं

4 mins
383


1.उठो बेटियों--------

उठो बेटियों, नव दुर्गा बन दुष्टों का संहार करो।

जागो, कि यह कालरात्रि है अंधकार पर वार करो।

मानवता के धर्म युद्ध में दानवता का नाश करो।

हैवानों की इस दुनिया में अब कदर तुम्हारी नहीं होगी।

सीता - सावित्री बनकर अब गुजर तुम्हारी नहीं होगी।

आसमान को छूने वाली धरती पर हुंकार भरो।

उठो बेटियों, नव दुर्गा बन दुष्टों का संहार करो।

जागो, वरना जीव-जगत में हाहाकार मच जाएगा।

बेटी-बहनें नहीं बचीं तो सर्वनाश हो जाएगा।

इन व्यभिचारी-विषधरों के फन कुचलो, और प्राण हरो।

उठो बेटियों, नव दुर्गा बन दुष्टों का संहार करो।

करूणा-ममता की स्रोत हो तुम असुरों के निमित्त काली-रूद्रा।

तुम आदि शक्ति मानवता की जग-जननी प्रचंड मशाल बनो।

झंझावातों में भी जलती तुम दीपशिखा का गान लिखो।

उठो बेटियों, नव दुर्गा बन दुष्टों का संहार करो।

तोड़ रूढ़ियों के सब बंधन एक नया इतिहास रचो।

दुर्गावती, रानी झाँसी - साउन्मत्त गौरव गान लिखो।

दूर हिमालय की चोटी से धरती का उनवान लिखो।

उठो बेटियों, नव दुर्गा बन दुष्टों का संहार करो।


2.गुलाबी_ठंड-----

कुम्हलाई कलियों ने आँखें खोली हैं। अरमानों की पंखुडियाँ खिल गयी हैं।

मन-मकरंद पीकरधरा मदमस्त हो गयी है।

स्वप्नों की इंद्रधनुषी छटा बिखेरने रंग - बिरंगी तितलियाँँ उतर आई हैं मन - आँगन में।

धुप्प अँधेरे को चीरकर छिटकी है उम्मीद की रोशनी मन का अँधेरा मिटाने को।

तपती धूप और नेह भरी बारिश के बाद जाड़े की गुलाबी ठंड बहुत भा रही है

न जाने क्यों ?शायद इसमें पास न होकर भी तुम्हारे पास होने का गर्मा गर्म एहसास जो है !


3.उठे जब भी कलम--------

उठे जब भी कलम तो युगबोध की स्याही से समय के पन्नों पर मानवता का एक नया इतिहास लिखे।

भावनाओं में गुँथक रएहसासों की गीली मिट्टी से शब्दों का आकार लिए नेह का अविरल प्रवाह लिखे।

उठे जब भी कलम तो सीमाओं पर अहर्निश डटे माँ भारती के वीर सपूतों कागर्वोन्नत दीप्तिमान भाल लिखे

।आपादमस्तक मिट्टी में सनेमौसम का क्रूर प्रहार झेलते और अपने वजूद से जूझते आकंठ कर्ज में डूबे

किसानों की अंतहीन पीड़ा और उनके दर्द की ज़ुबान लिखे।

उठे जब भी कलम तो दम तोड़ते युवा-स्वप्नों की दारुण व्यथा लिखे।

और, तंत्र के हाथों दमित-भ्रमितलोक की अंंतहीन कथा लिखे।

निर्भयाओं की रक्तरंजित देह और श्मशान में जलती उनकी चिता की आग लिखे।

और, सभ्य जनों के प्रबुद्ध प्रजातंत्र में दुराचारियों-अपराधियों की जीत की अनुपम-अतुलनीय कहानी लिखे।

उठे जब भी कलम तो जनता के स्वेद-रक्त सिंचित श्रम पर ऐश्वर्य भोगते नेताओं-नौकरशाहों की 

उठती गगनचुंबी इमारत लिखे।

अपराध और राजनीति के दलदल में पनपी अनीति और अनाचार की अनकही-अनसुनी कहानी लिखे।

सत्ता और कुर्सी के खेल में ईमान, जमीर और नैतिकता की सरेआम होती नीलामी लिखे।

उठे जब भी कलम तो युवाओं की जुंबिश मौजों की मचलती रवानी और

फौलाद बनते कंधों की नयी उन्मत्त कहानी लिखे।

लिखे, तो अर्थ खो चुके शब्दऔर शब्दों में छुपे हर्फ़ों के सही मायने लिखे।

लिखे, तो जुल्म की आग में सुलगती-जलती-धधकती युग-युगीन प्रचंड मशाल लिखे।

लिखे, तो अपने समय की पीड़ा और सत्य का उनवान लिखे।


4.आखिर कब तक-------

आतंकवाद की आग में सुलगती रहेंगी सीमाएँ, जिस्मों के उड़ते रहेंगे चीथड़े,

और, गाँव की दहलीज पर आती रहेंगी शहीदों की अर्थियाँ आखिर कब तक ?

घृणा, नफरत, वैमनस्य की आग जलाकर राख करती रहेगी प्रेम-अपनत्व और

भाईचारे को खौलता रहेगा अवाम और आहुति दी जाती रहेगी गाँधी, बुद्ध,

महावीर की विरासत की इंसानियत के इस महायज्ञ में आखिर कब तक?

दिलों में पलता आक्रोश सपनों के बिखरने का असंतोष और सृष्टि के कण-कण में

व्याप्त अणुओं का महाविस्फोट रूका रहेगा इन दिलों में आखिर कब तक ?


5.यादें कुछ धुँधली-सी--------

वक्त की सिलवटों में सिमटी हुई अंतहीन यादें

कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ अनसुनी-सी फरियादें।

खामोश - से वे लम्हे, डरी-डरी सी कायनात दरवाजों पर

महामारी की बेमुरव्वत दस्तक।

बदहवास घर लौटते मजदूरों की पीड़ा, पाँवों के छाले

और अंतहीन सफर में ज़िंदगी - मौत की जद्दोजहद।

वो बेबस ज़िदगियाँ जो पटरियों पर ही थम गयीं वो थके कदम

जो घर की दहलीज पर आकर टूट गये।

मानवता के अनगिन देवदूतों का त्याग और

समर्पण प्राण बचाने में जिन्होंने किए अपने प्राण निछावर।

वक्त की करवटों में कैद नस्ल भेद, संप्रदायवाद का जहर

अड़ियल शहंशाहों का पतन और अधिनायकवाद की हार।

रामराज्य का सुहाना सपना और जीवन - मूल्यों का क्षरण बैरभाव,

वैमनस्य भुलाकर सुकून से जीने की अकुलाहट।

श्रम के तवे पर सिंकी रोटी की युग-युगान्तरकारी पीड़ा और

हड्डियों तक को गलाती ठंड में गुजरती निष्ठुर रात।

सत्ता के मद में चूर रहनुमाओं की बेदर्द रहनुमाई और

अपने वज़ूद के लिए लड़ते किसानों का प्रतिरोध।

धुप्प अँधेरे में कहीं दूर से छिटकती उम्मीद की एक किरण

और कठिन संघर्ष से उपजे इंद्रधनुषी सपनों का उत्सव।



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