ज़रूरी नहीं
ज़रूरी नहीं
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ज़रूरी नहीं यह धरती यह आसमां
तेरे इशारों पर चलें
ज़रूरी नहीं यह सागर यह नदियां
तेरे कहने पर ही बहें
ज़रूरी नहीं कि हम सब की दुनिया
तेरे तय किए ढांचे में ढले
ज़रूरी नहीं रिश्तों की नज़दीकियां
तेरी मरज़ी से बढ़ें घटें
ज़रूरी नहीं दुनिया की सारी रंगीनियां ,
तेरी जी हज़ूरी करें
ज़रूरी नहीं हर ओर सदा हों रानाइयां
तेरे लिए सभी जिएं मरें!ह
पाल रखें हैं भरम कितने अरे नादान
ख़ुद को समझ बैठा धुरी
सारी क़ायनात का-कैसा तेरा अभिमान
दंभ और अहं की पैनी छुरी
धीरे धीरे कर देती नष्ट तेरा ही गुमान
जब लगती है चोट कोई गहरी
जब कौंधती बिजली, गरजता आसमान
हाथ पांव बंध जाते,ज़िंदगी बहरी
सुने न तेरी पुकार,तब जाकर खुलती आंख
चारों ओर जब अंधेरे कर देते विवश
रूह जाती सिहर, तब जाकर खुलती आंख!
कर ज़िंदगी का मान ,शक्ति उसकी पहचान
शुक्रगुज़ार हो, अपने दायरों को ले पहचान!
