नारी हूं मैं....।
नारी हूं मैं....।
सीने में मेरे भी दिल धड़कता है,
मेरी इन आंखों में सपने पनपते हैं,
मुझमें भी कुछ करने की तमन्ना है,
मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं,
माना मैं नारी हूं पर हूं तो एक इंसान ही,
मेरी भी जरूरतें है आवश्यकताएं हैं,
मुझे भी कुछ करना है कुछ बनना है,
आसमां की बुलंदियों को छूना है,
माना मैं नारी हूं पर हूं तो एक इंसान ही,
जिस प्रकार सपनों पर किसी का वश नहीं,
उसी प्रकार मुझमें और पुरुष में कोई भेद नहीं,
वो वंश है तो मैं भी अंश हूं,
वो बन सकते सहारा तो मैं संभालती घर हूं,
वो कर सकते जो काम उसमें भी मैं सक्षम हूं,
माना मैं नारी हूं पर हूं तो एक इंसान ही,
सब ईश्वर की देन है उसमें क्या कोई अंतर,
एक हाथ से जब नहीं बज सकती ताली भला,
तो कैसे सृष्टि का संचार कर सकता अकेला पुरुष है,
स्वयं शिव शंभु महाकाल भी उमा बिन अधूरे हैं,
तो हम तो उनकी मात्र संतान है,
नारी और पुरुष दोनों बनाते सृष्टि में संतुलन है,
एक घर है तो दूजी नींव,
एक धूप है तो दूजी छांव,
एक भोर की लालिमा तो दूजा रात की अंधियारी,
दोनों बिन सृष्टि की कोरी कल्पना मात्र भी नहीं।
