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anchal k ashvi

Inspirational Others

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anchal k ashvi

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कविता - मैं और वो

कविता - मैं और वो

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आज मैं आ खड़ा हुआ

आईने के सामने।

वो भी आ गया

मेरे ही समक्ष।


मैं देख रहा था उसे एकटक,

वो भी देख रहा था मुझे।


पहले वह कुछ हड़बड़ाया,

देख उसे मैं भी घबराया।


वह था बिल्कुल मुझ-सा,

मैं भी बिल्कुल उस जैसा।


फिर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा,

मैंने भी उसे ढांढस बंधाया।


हमारी आँखें टकराईं,

मन में सवालों की बाढ़ सी आई।


वह अब भी वैसे ही खड़ा था।

मैं कुछ लजाया।


मैं थोड़ा झिझकता,

एक कुर्सी खींच लाया।

हमने बैठने से पहले हाथ मिलाया।

अब हम आमने-सामने थे।


"क्या बात?

चेहरा क्यों मुरझाया?"

मैंने पूछा।


वह हल्की मुस्कान लिए बोला,

"हम-तुम दोनों एक हैं,

और तुमने ही हम-तुम्हारा यह हाल बनाया!"


मैं उसकी बातों पर चौंका,

लगा जैसे वह व्यंग्य करता हो, देखकर मौका।


"ऐसा क्यों कहते हो?

आख़िर तुम भी तो मुझमें ही रहते हो!"

मैंने प्रतिरोध किया।


उसकी मुस्कान और गहराई।

मेरी आँखों में नाराज़गी उतर आई।


"तुमने खुद ही अपनी क़ीमत घटाई,

जब मैंने समझाया,

तो तुम्हें बात रास न आई!"


अब मुझसे सहा न गया।

आँखें छलक पड़ीं,

गला भर आया,

पर मैं कुछ कह न पाया।


पर वह चुप न रह पाया।


"तुमने लोगों के लिए अपनी नींद उड़ाई,

अपना सब लगाया,

भावों की संपदा लुटाई,

पर बदले में केवल वेदना ही पाई।"


मैं चुप, वह कहता रहा...


"जब-जब विश्वास किया,

तब-तब छल पाया।

जब प्रीत लगाई,

तब केवल फ़रेब पाया।

पर तुम्हें समझ न आया।"


बस!

यही सब सहते-सहते

मेरा-तेरा चेहरा मुरझाया।


मैंने सब चुपचाप सुना,

सब कुछ सही पाया,

पर अपराधबोध के मारे

नज़र न मिला पाया।


उसने धीरे से मेरा कंधा थपथपाया,

और गुरु की वाणी में समझाया—


"हर कोई तुम्हारे प्यार का हक़दार नहीं,

हर कोई तुम्हारे भावों का ख़रीदार नहीं।

कोई तुम्हारी आत्मा का दावेदार नहीं,

और न ही कोई तुम्हारा स्वामी।

तुम किसी के गुलाम नहीं।"


उसकी बातें मेरे भीतर उतर गईं।

मैंने सिर उठाया।

वह हल्के से मुस्कुराया।

बड़े प्यार से समझाया।

**"तुम प्रीत के योग्य हो,

विरह के नहीं।

विरह मिले भी तब

तुम रोने के योग्य नहीं।


तुम विश्वास की सजीव मूरत हो,

घात के योग्य नहीं।

तुम अच्छे हो,

पर छले जाने के लिए नहीं।


अपनी अच्छाई और सच्चाई को बनाए रखना,

अपने लिए—और के लिए नहीं।"**


यह कहकर वह चुप हुआ।

मैं भी फिर उठ खड़ा हुआ।



अश्वी 




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