कविता - कुछ लोग
कविता - कुछ लोग
कविता - कुछ लोग
– अश्वी
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो जीते हैं
कल्पना और यथार्थ को साथ लेकर,
कुछ न मांगकर – केवल देकर।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो आर या पार चाहते हैं।
उन्हें नहीं चाहिए कोई अगर-मगर,
लेकिन, किंतु, परंतु।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो बीच में रह नहीं सकते,
वे या तो दाएँ चलते हैं या बाएँ।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो खुद को जताने में होते हैं कच्चे,
मगर कर्मों से होते हैं सच्चे।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो बातों में नहीं,
चित्रों, कविताओं और लेखनी में
खुद को व्यक्त कर पाते हैं।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो बेशक बहुत बोलते हैं,
पर मन का भेद
सरलता से नहीं खोलते।
जो दिल में है,
वो नहीं बोलते।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जो हर किसी को
एक ही पैमाने पर नहीं तोलते।
कभी बुरा बोल दें,
पर अच्छा करते समय सोचते भी नहीं।
होते हैं कुछ लोग ऐसे,
जिन्हें नहीं आता
भावनाओं को नियंत्रित करना,
भेद करना या
द्वेष रखना।
अगर लगाव नहीं,
तो कोई उन्हें डिगा नहीं सकता।
और अगर लगाव है,
तो उसके साथ प्रेम, चिंता, मंगलकामना भी मिलती है।
होते हैं कुछ लोग ऐसे
वे शिकायत नहीं करते।
बस चुपचाप पीछे हट जाते हैं।
और बहुत दूर कहीं एकांत में खो जाते हैं।
होते हैं कुछ लोग ऐसे
जो किसी के लिए
प्राथमिकता नहीं,
सबके लिए
अंतिम विकल्प होते हैं।
वे लोग भी हैं – मानव मात्र।
फिर भी उन्हें
छला जाता है,
उपयोग किया जाता है,
और काम निकल जाने पर छोड़ दिया जाता है।
वे कुछ लोग
उफ़्फ भी नहीं करते,
बस अपनी चाल चलते जाते हैं।
होते हैं कुछ लोग ऐसे भी।
