कविता - बाहर और भीतर का युद्ध
कविता - बाहर और भीतर का युद्ध
जब युद्ध होते हैं, रणभूमि में।
आदमी-आदमी में।
धन के लिए, भूमि के लिए।
वे युद्ध शुरू होते हैं, खत्म हो जाते हैं।
फिर लिखे जाते हैं इतिहास की किताबों में।
जिन्हें सब पढ़ते हैं, क्योंकि पढ़ना पड़ता है।
पर
जो युद्ध होते हैं, मन की अथाह गहराइयों में।
युद्ध जो होते हैं, विचार-विचार में।
अच्छे-बुरे में, सही-ग़लत में।
सच और झूठ में, जो चाहते हैं पहुंचना किसी निष्कर्ष पर।
वे युद्ध लिखे जाते हैं—
मन के शिलालेखों पर, विवेक के कागज़ों पर, दिमाग की पोथी पर।
पर वे पढ़े नहीं जाते।
वे बस जीवन भर मन में ही विचरते रहते हैं,
जब तक सांस न थमे।
और जब सांसें रुक जाती हैं,
तभी ये युद्ध खत्म होते हैं।
— अश्वी!
