STORYMIRROR

Manpreet Makhija

Abstract

4  

Manpreet Makhija

Abstract

कविता के दिल से

कविता के दिल से

1 min
420

मैं कविता हूँ

कलम से मैं जन्मी हूँ

ख़यालो का मैं आईना हूँ

कवि, कवियत्री के दिल की

सच्चाई का मैं कोना हूँ

मैं कविता हूँ


कभी तन्हाई की साथी बनूँ मैं

कभी दर्द को छलकाने वाला पैमाना

कहीं भावनाओं को शब्द देती हूँ

तो कहीं व्यंग्य बन साधू निशाना


जिसने जैसे चाहा वैसे लिखा मुझे

मैं हर रंग , हर रस मे ढली हूँ

कभी बनी इक सैलाब बदलाव का

तो कभी क्रांति बनकर एक उम्र तक चली हूँ


युगों युगों से जीवित हूँ मैं

अभी और भी जीवन शेष है

न बोली, न भाषा, न जात न सीमा कोई

विशेष तो मुझमे निहित संदेश है


हाँ,मैं कविता हूँ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract