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Anil Pandit

Abstract Drama Fantasy

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Anil Pandit

Abstract Drama Fantasy

कुछ लम्हें बहते पानी के

कुछ लम्हें बहते पानी के

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विरह के बहते   पानी  में,

हाँ, बहते  पानी  के विरह में,

कुछ परछाइयाँ  दिखाई  देती हैं,


किसकी है, ये परछाइयाँ ?

क्या  ये युगों-युगों से इसके भीतर है ?


फिर भी ये परछाइयाँ  संवाद करती है

गीत गाती है


जंगल के जुगनू जब प्यार के गीत गाते हैं

उनके स्वर में स्वर मिलाती है


कभी कभी उदास होकर,

विरह के गीतों को भी  गाती है


क्यों गाती है गीत विरह के?

 अधूरे प्यार की ये परछाइयाँ ,

तड़पते प्यार की ये परछाइयाँ ,


विरह के पानी के भीतर बिखेर है,

सुलगते  कुछ प्रश्न और उनेक उत्तर भी

इन प्रश्न और उत्तर में कहीं,

बर्फ की तरह  घुल जाती हैं ये परछाइयाँ


बसंत के पत्तों पर  धूप आती थी,

धूप से  संवाद करती थी, ये परछाइयाँ

कुछ लम्हें अपने नाम लिख लेती थी

ये परछाइयाँ


ठंडी ठंडी बयार में,

ये परछाइयाँ  पिघल जाती थी,

और रेशम के कागज पर रेशमी सवेरा  हो जाती थी,

ये परछाइयाँ , ये परछाइयाँ


अधूरे प्यार  की परछाइयाँ

तड़पते प्यार  की परछाइयाँ


विरह के बहते पानी में ,

हाँ, बहते पानी के विरह में

कुछ परछाइयाँ  दिखाई  देती है


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