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Anil Pandit

Abstract Drama Fantasy

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Anil Pandit

Abstract Drama Fantasy

रिक्त नहीं होता है

रिक्त नहीं होता है

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एक काग़ज़

हमेशा रिक्त नहीं होता है,

वहाँ होती हैं  अनगिनत ख्यालों की हलचल

जो हमेशा ही अव्यक्त  रह जाती है,

 

एक  पर्ण,

जो सूख कर छूट चूका था शाखा से,

क्या वो रिक्त था?

नहीं, उसमें तो कितने  ऋतुओं की यादें थीं

 

एक नज़रं,

क्या किसीने उसे कभी पढ़ा है?

कितने सारे गम के मकानों का बसेरा था,

फिर वो रिक्त कैसे हुआ?

 

 

एक साहिल,

क्यों नहीं है वो रिक्त,

वो एक  और क्षितिज की राह में है

 

यहाँ -वहाँ, कहीं भी देख लो,

कोई भी रिक्त नहीं होता

कोई रिक्त नहीं होता है

 

एक धूप का क्षण

कभी भी रिक्त नहीं हुआ

मौसम के बदलते रवानी से

 

क्यों किकोई भी रिक्त नहीं होता

रिक्त नहीं होता है कोई भी

 

एक  खेल,

जिसमेंहार-जीत कोई मायने नहीं रखती

क्यों नहीं रिक्त होते हैं उस खेल के मायने

 

क्यों कि कोई कभी भी,

रिक्त होता नहीं,

रिक्त नहीं होता है

कोई कभी भी


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