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Anil Pandit

Abstract Drama Inspirational

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Anil Pandit

Abstract Drama Inspirational

एक कसक….

एक कसक….

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 कसक….

बारबार याद आती है,

यादों के दरख्त पर जो सपने उड़ते रहते हैं,

उन्हें चुनकर ज़ज्बात के संदूक में छिपाकर रखती हैं

 

एक कसक

बारबार याद आती है,

भागती-दौड़ती मंजिल पीछे कितनी परछाइयां रास्ते में खड़ी हैं उन्हें  गिनती  रहती हैं

 

एक कसक….

बार-बार याद आती हैं,

सुलगते हुई बारिश में कितनी बूंदे ग़मगीन होकर बरसती है उनका हिसाब रखती हैं

 

एक कसक….

बार-बार याद आती हैं,

मन के तपिश में कितने बेआवाज़ दर्द चुपचाप बैठ हुए  है उन दर्द की शोर भरी आवाज होना चाहती है

 

एक कसक…..

बार-बार याद आती है,

बर्फ से पिघलते  वो लम्हें जो वक़्त की तन्हाई में पूरी तरह से जम चुके हैउस तन्हाई की बेबसी की बातें छिपाना चाहती हैं

 

एक कसक ….

जो बा-बार याद आती है,

कुछ पुराने ज़ख्म कभी-कभी खामोशी तोड़कर बोलना चाहते हैंउन पुराने ज़ख्मों को काग़ज़ पर अक्षर-अक्षर लिखना चाहती हैं

 

एक कसक…..

बार-बार याद आती है,

तैरते हुए आसमान पे कुछ रंग उसके अस्तित्व के लिए है,

रंगों से अपनी अस्तित्व की अस्मिता को चित्रित करना  करना चाहती है

 

 कसक….

बारबार याद आती है,

 


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