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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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कुछ ख्वाब ख्वाब ही रहते हैं

कुछ ख्वाब ख्वाब ही रहते हैं

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कुछ ख्वाब , ख्वाब ही रहते हैं

कुछ अपने दूर ही रहते हैं।

मंज़िल की ओर बहुत से मुसाफिर चलते हैं।

कुछ तो मंजिल पा जाते हैं , कुछ रास्ते में ही तबाह हो जाते हैं।


कुछ ख्वाब , ख्वाब ही रहते हैं।

कुछ अपने दूर ही रहते हैं।


सम्हल कर हर कोई चलता है।

पर हर कोई सम्हल नहीं पाता।

इश्क़ को जो खेल समझते हैं इश्क़ खेल उसका बनता है।

और हिकारत से जो देखते थे शायरों को , वो ही अब शेर सुनते हैं।


कुछ ख्वाब , ख्वाब ही रहते हैं।

कुछ अपने दूर ही रहते हैं।


जिन्हें कभी कुछ याद नहीं रहता था।

वो एक को शक्स भूल नहीं पाते हैं।

कभी किसी चीज़ की परवाह नहीं की जिसने , आज बड़े समझदार नजर आते हैं।


और अनिल ये इश्क़ बीमारी जिसे लग जाती है ना ,

वो बर्बाद हो जाते हैं।


कुछ ख्वाब , ख्वाब ही रहते हैं।

कुछ अपने दूर ही रहते हैं।कुछ


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