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Swati K

Classics

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Swati K

Classics

कुछ इस तरह हो तुम......

कुछ इस तरह हो तुम......

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उलझी,कहीं सुलझी सी
गांठों में बंधी,कहीं सूखे पत्तों सी बिखरी
कहीं खुशियों से छलकती आंखें
कहीं आंखों में नमी ढूंढते अधूरे टूटे सपने......

कहीं खिलखिलाहटों से रौशन होती घर की दीवारें
कहीं मुस्कुराहटों तले दबी सिसकियों से 
गूंजती नुक्कड़ गलियां
कांटों पे चलकर आसमां पाने का जुनून
कहीं बूढ़े पैरों का सहारा बनने का सुकून......

राहों में करवटें लेती
सब्र और तसल्ली से जीने का हौसला देती
जाने कितने रंगों की घूंघट ओढ़े
हौले हौले घूंघट उठाती,लम्हा लम्हा
बेशुमार एहसासों की परतें खोलती......

पर जाने क्यों अनसुलझी पहेली सी जिंदगी
शायद कुछ इस तरह हो तुम जिंदगी
कुछ इस तरह हो तुम जिंदगी.......Swati












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