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Pratz Bhavsar

Drama Romance

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Pratz Bhavsar

Drama Romance

कुछ भी नहीं बदला

कुछ भी नहीं बदला

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कुछ भी नहीं बदला,

सब कुछ दिल के कमरे में वैसे ही संभाल कर रखा है,

पता है कुछ सवाल होंगे,

फिर उनके जवाब देने में गर देर हो गयी तो फिर,

और बढ़ जाएँगी दूरियां !


तुम्हे हर चीज़ बिलकुल सलीके से रखना पसंद था,

आज भी दिल के झरोखे से दिखता है तुम्हारा झरोखा,

वही हवा से लड़ती तुम्हारी ज़ुल्फ,

वही फिसलता हुआ दुप्पटा,

और हां वही तुम्हारी नज़र !


सब कुछ संभाल कर रखा है मैंने,

हाँ बाबा उसी दिल के कमरे में,

बिलकुल तुम जैसा चाहती थी वैसा,

कुछ भी नहीं बदला !


तुम्हारी वो खास मेज़,

बस उसको ढक दिया है मैंने,

बिलकुल धीरे से तुम्हारी यादों के धागों से बने उस मेज़पोश से,

उनपर सजाया है तुम्हारी खुशबू से भरे फूलो का गुलदस्ता !


चाय का कप,

है वो भी है रखा हुआ,

कप के कोने में आज भी चमकती है,

वो तुम्हारे होंठों कि लाल धार !


और हां,

वो जो सब पल थे न,

उनको भी संभल कर रखा है,

उसी घडी में जो उस दिन बंद हो गयी थी,

आज भी वही वक़्त दिखाती है,

कुछ भी तो नहीं बदला !


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