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Vivek Madhukar

Abstract Tragedy Inspirational

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Vivek Madhukar

Abstract Tragedy Inspirational

कृष्णावतार

कृष्णावतार

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मानव के लहू का प्यासा

   हो रहा आज मानव है

ज्यों उसके भीतर का

   जाग गया दानव है।


भ्रष्टाचार का हो रहा तांडव

   मचा चारों ओर हाहाकार है

त्रस्त हैं पांडव, नहीं कोई माधव

   करने को उनका उद्धार है।


दुर्योधनों – दुशासनों का

   छा रहा आतंक है

द्रौपदियों पर जबरन लगाया

   जा रहा कलंक है।


मना रहे हर रोज़ मधुमास

   ये तथाकथित कर्णधार मनीषी हैं

लिखी जा रही कलुषित कलम

   से नित नयी अनाचार पच्चीसी है।


कब होगा हमारी कालकवलित

   मातृभू का उद्धार

क्या संभव नहीं हर मानव में

   हो कृष्णावतार ?


कवि का मन उदास है

पर दिल में अभी

   भी आस है।


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