STORYMIRROR

Randheer Rahbar

Abstract

4  

Randheer Rahbar

Abstract

कोई नहीं अवतार

कोई नहीं अवतार

1 min
352

सतयुग का दौर गया अब,

आया कलयुग का राज।

खून हुआ सस्ता पानी से,

हाथ आ गया अधम के राज।


बेशर्मी की हद हुई,

गई दान-दया, धर्म और लाज।

महज खिलौना बन कर रह गया,

कानून है आज।


हर महफ़िल में बिछी है चौसर,

दांव लगी नारी है आज।

सहस्त्र है दु:शासन यहाँ पर,

लुट रही चौराहे पर द्रौपदी की लाज।


किसे पुकारे आज बेचारी,

सहस्त्र आपदाओं से घिरी हुई है वो लाचार।

लाज बचाने को द्रौपदी की,

आज कोई नहीं अवतार।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract