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Dr Pragya Kaushik

Abstract

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Dr Pragya Kaushik

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कल की पीढ़ी

कल की पीढ़ी

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कल की पीढ़ी 

आज की पीढ़ी से

बतिया रही है

संस्कृति मुझसे 

अब तुम्हारी धरोहर 

बनने जा रही है

इन झुर्रियों पर

मासूमियत की ये मोहर

भरोसे पर उम्मीद की

बुनियाद बिछा रही है


हाथों में हम दोनों के 

कल का निर्माण और

कल का निर्वाण 

निर्धारित हो रहा है

तजुर्बे को अभ्यास 

की अर्जी लगाई जा रही है

दोनों ही में 

आज का सत्य 

संकल्प दृढ़ हो रहा है

कल, आज और

कल की विधा 

नई पीढ़ी की

सृजित ,स्पंदन ,अविरल

सी झंकृत हो रही है।


पूर्ण पुरातन और

नवनूतन का संगम 

गीत नेह आह्वान के नवीन

गा रही है।


लकीरें तजुर्बे की 

चेता रही हैं

कदाचित न तुम 

घबराना आंधियों से

हौंसलों को तुम्हारे परखने

की कवायदे लगाई जा रही हैं

पर उडान कोई रोके इनकी

ऐसे अंकुश की साजिश 

झुर्रियों से मात खा रही है।



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