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Dr Pragya Kaushik

Inspirational

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Dr Pragya Kaushik

Inspirational

देर है पर आंधेर नहीं

देर है पर आंधेर नहीं

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न परछाई छूट जाये मेरी

न नाम भी गुम हो जाए कहीं 

यादों को हौसलों में लपेटे 

खुद को समेट कर 

चला गया मैं वहाँ से,

चला गया जहां

सवाल ही जवाब था

मेरे जाने का

और सवाल ही सवाल था मेरे 

आने का भी

हिम्मत फिर से जुटाई मैंने 

कलम फिर से उठाई 

सवालों के कटघरे से उपर

सवाल मैंने भी किए ,

न कलम लड़खड़ाई मेरी

न उम्मीद ने दामन छोड़ा

आवाज़ भी उठी वहां से

हाथ भी बढ़े संबल में

फिर सोचा मैंने -

"देर है पर अंधेर नहीं '

रुकूंगा नहीं ,झुकूंगा नहीं

लेखनी पर मेरी 

अब कोई अंकुश नहीं

और मैं चल पड़ा रोशनी की

ओर फिर उसी तलाश में

खुद से आंख मिलाने के लिए

तुम्हारे यक्ष प्रश्नों के जवाब में

मैं चला गया आने के लिए।



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