क़िस्मत और तुम
क़िस्मत और तुम
मैं आज तक एक बात समझ नहीं पाया।
मैं अच्छी क़िस्मत से तुम से मिल पाया।
तुमसे मिलकर क़िस्मत को चमका पाया।
मैं आज तक एक बात समझ नहीं पाया।
तुम मेरी क़िस्मत हो या क़िस्मत से तुम हो।
इसी पेशोपेश में हूं, मगर खुश हूं कि तुम हो।
तुम हो तो अब लगता है, सब अच्छा होगा।
जो खो गया था, वह भी मुझे वापस होगा।
तुम्हारे आने से ही मेरे जीवन में बहार आई है।
जो रूठी हुई सी थी, वह खुशी वापस पाई है।
अब तो ढलते हुए सूरज से मुझे डर नहीं लगता।
मैं अब अंधेरे से नहीं, अंधेरा है अब मुझसे डरता।
अब तो तुम भी और मेरी क़िस्मत भी क़रीब है।
अब तो मौत भी आ जाए मुझे कोई ग़म नहीं है।
अब जो हमें जुदा करे, केवल वही एक हबीब है।
क़िस्मत और तुम हो तो ज़िंदगी में वह दम नहीं है।

