ख्वाब
ख्वाब
माना सफर आसान नहीं
कांटों से भरी राहें सही
बुलंद इरादों की डोर थाम
"ख्वाबों" के काफिले
निकल पड़े मंजिल से मिलने को...
जब सपनों की दुनिया से परे
हकीकत से मिलना हुआ
भूखे बिलखते कुछ मासूम
बचपन से सामना हुआ
कागज के नावों से
खेलने वाले नन्हे हाथ
आज गलियों चौराहों पे
दर बदर भटक रहे
कहां खो गई उनकी
वो नजाकत वो नटखटपन
बस ख्वाब बनकर ही रह जाता
क्यों उनका ये बचपन
चारों तरफ गरीबी का मंजर
कितना कुछ बयां कर जाता
छोटी सी उम्र पर ना जाने
कितना बोझ कंधों पे लिए
ना जाने कितने अरमान
दिल में संजोये हुए
''बड़ा आदमी'' बनने की चाहत
और चाहत पाने का जुनून लिए
संघर्षों से भरी जिंदगी की परतों तले
अपनी अपनी मंजिल तलाशते
बढ़ चले राहों पर वो नन्हे पांव
कभी बादलों को चीर
आसमां में उड़ने को बेताब
कभी सूरज की तपिश में
तपकर चमकने को बेकरार
आंधियों में बिखरकर टूटकर
फिर खुद पे भरोसा कर
तो कभी दर्द की फिक्र छोड़
लंबी ऊंची उड़ान भरते
तो कभी वक़्त के सिखाए तजुर्बों से
जीने को तैयार अब बड़े हो चुके वो नन्हे जान
"ख्वाबों" को हासिल करना ही है
अंधेरों से जीतकर उन्हें खुली
फिजा में पंख फैलाना ही है
हाथों की लकीरों को आज बदलना ही है
"ख्वाब" जो देखे उनमें रंग भरना ही है...
