STORYMIRROR

Mahesh Kumar

Abstract

4  

Mahesh Kumar

Abstract

खोटा सिक्का

खोटा सिक्का

1 min
454

भुला खुद को यार कही तू, चल कर ले अब याद

खोटा सिक्का ही रहता है, सदा अपनों के साथ


तुझ में भी है आग छुपी वो, जो जलती है दिन-रात

सूझ-भुझ के माप-तोल ले, अपनी किस्मत अपने हाथ


भुला खुद को यार कही तू, चल कर ले अब याद

खोटा सिक्का ही रहता है, सदा अपनों के साथ


खूब कमा के धन जुटाया, अपनों से न मिलने आया

रह गई यादों की एक बारात, छुटी दुनिया छुटा साथ


भुला खुद को यार कही तू, चल कर ले अब याद

खोटा सिक्का ही रहता है, सदा अपनों के साथ।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract