खिलौना
खिलौना
इस खिलौने में न जाने फूंकी है
सपने देख रहा वो, इश्क़ जैसे रोग पाल रहा है वो।
कहता जिंदगी की लकीर उसकी छोटी है,
कोई समझाओ इसे की ये पूरी कायनात ही झूठी है।
कौन था वो किस ने इस खिलौने में जान फूंकी है?
इसे कहो जाकर यूँ न देख सपने हजार
टूट के बिखरे तो चुभेंगे बार बार।
हालातो ने इसे अब इंसान बनाया है,
खींच के उसे खुदा के दर पे लाया है।
किया न जिक्र एक बार भी उसका तो
क्यों तेरी आँखे उसके सामने झुकी है ?
कौन था वो किसने इस खिलौने में जान फूंकी है ?
