STORYMIRROR

shivani j

Others

3  

shivani j

Others

कोशीश

कोशीश

1 min
270

हाँ! हाथों की लकीरे मैंने 

बार बार पढ़ी है।  


आईने में शक़्ल बार बार देखी है। 

बनना चाहा जब भी कुछ 


ज़माने से औकात बार बार निकली है।


जिद है, तुम जिद ही समझना

जब सौ बार गिर के भी 

आसमां छूने की कोशीश बार बार की है।  


Rate this content
Log in