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Krishna Khatri

Abstract

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Krishna Khatri

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कहानी दो लफ्ज़ों की

कहानी दो लफ्ज़ों की

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मां ने मुझको जन्म दिया 

बड़े ही नाजों से 

पाला-पोसा बड़ा किया 

अपनी हर सीख से 

पारंगत किया 


लेकिन बात-बात में वो 

एक बात कहना 

कभी न भूली - 

रानी बिटिया 

तुझे पराये घर जाना है 

आखिरकार

वो पराया घर भी आया 


जहां रहना था मुझको 

अब ज़िन्दगी भर के लिए 

जाते-जाते मां ने कहा -

अब यही घर है तेरा 

शुरू-शुरू में तो 

मुझको भी लगता था ये

मेरा अपना घर 


गुजरते वक्त के साथ 

सब गुजरता गया 

ये सब मेरे अपने थे 

लेकिन मैं

इनके लिए पराई थी 


पराई रही 

जब भी कोई खास बात होती 

मेरे सामने नहीं की जाती थी 

मैं पराए घर से जो आई थी 

इसलिए पराई थी 


उस घर ने अपनाया नहीं 

क्योंकि पराए घर जाना था 

इस घर ने भी दूर रखा 

इसलिए कि

पराए घर से जो आई थी 


अब तो जवानी भी 

दम तोड़ने लगी

फिर भी मैं रही पराई 


बस यही तो है मेरी

दो लफ्जों की कहानी 

मैं पराई थी 

और

पराई ही रही !


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