कहाँ गए वो
कहाँ गए वो
ना दिखती पीपल की छाँव ,
ना दिखता अब प्यारा गाँव।
बारिश तो अब भी होती ,
पर ना दिखती कागज़ की नाव।
रोज सुनाती एक कहानी ,
कहाँ गई वो दादी- नानी।
कहाँ गईं वो सारी परियाँ ,
अद्भुत , अनदेखी अनजानी।
ना दिखती चन्दा मामा की ,
वो चाँदी की एक कटोरी।
नहीं सुनाती अम्मा भी अब ,
वो प्यारी सी लल्ला लोरी।
बच्चे तो अब भी हैं ,
पर अब ना है वो प्यारा सा बचपन।
आपाधापी - भागम दौड़ी ,
ने छीना हम सब का जीवन।
