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Sheetal Jain

Abstract

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Sheetal Jain

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कछुए की पीड़ा

कछुए की पीड़ा

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मैं कछुआ प्यारा,

नाम शैल्बी लगता मुझको समुद्र न्यारा 

साथी संगी सब यही है मेरे,

संग खेल दिन रात यह बीते।


तुमको मेरा रहना रास न आया,

खोज रहा दूजा ठिकाना,

खड़ी कर रहे,भव्य दिव्य अट्टालिकाएँ 

छीन रहे मेरा आँगन।


इच्छाओं पर रोक लगाओ

प्रकृति में असंतुलन न लाओ,

आएगी विपदाएँ बहुत भारी 

तुम तो इंसान, समझदार प्राणी 

मत करो मुझसे यह नाइंसाफ़ी।


देता हूँ वचन तुम्हें,

ध्यान रखूँगा इस जल का मैं 

अब है तुम्हारी बारी,

वादा कर लो यह, न करोगे प्रकृति से छेड़खानी 

रहेंगी जग में चहुँओर ख़ुशहाली


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